SHRI Manibhadra veer

Ankit mehta

श्री मणिभद्र वीर – जीवन परिचय

मणिभद्र जी पूर्व जन्म में सेठ माणक शाह के नाम से जाने गये, जो जैन धर्म और इसके संदेशों के प्रति पूर्णतया समर्पित थे। इनके पास अपार संपत्ति थी तथा इन्हें 36 तरह के वाद्य यंत्रों का शौक था। वे एक निष्ठावान श्रावक थे। इनकी असीम निष्ठा भक्ति से इन्हें क्षेत्रपाल घोषित कर दिया गया था। इन्हीं की हवेली में पद्मावती माता का घर देरासर भी था।

एक बार माणकशाह का मन कुछ भ्रान्तियों के कारण धर्म से विमुख हो गया और उन्होंने देवदर्शन, पूजन इत्यादि बंद कर दिए। जब आनंदविमल सूरीजी मा. सा. उज्जैन के निकट पहुँचे, तो माणकशाह अपनी माँ के आदेश पर उनके पास गए। आनंदविमल सूरीजी मा. सा. ने ज्ञानदर्शन के माध्यम से माणकशाह की सभी धार्मिक विसंगतियों को दूर किया और वे फिर से निष्ठावान श्रावक बन देवदर्शन, पूजन, सामायिक इत्यादि धार्मिक क्रियाएँ सहृदय करने लगे।

एक बार माणकशाह किसी व्यापारिक कार्य से आगरा गए थे। वहाँ उन्हें जब आनन्दविमल सुरीजी का चातुर्मास आगरा में होने का पाता चला, तो वे दर्शन के लिए उनके पास पहुँचे। अपने गुरु से पवित्रता पर दिए गए उपदेशों व शत्रुंजय की महत्ता से बहुत प्रभावित हुए। इसी प्रभाव के कारण, इन्होंने नवणुनि यात्रा करने के लिए पैदल शत्रुंजय जाने व रयान वृक्ष के नीचे दो दिन के उपवास से इसे संपन्न करने की कठिन तपस्या का संकल्प लिया।

गुरु के आशीर्वाद से, कार्तिकी पूनम के शुभ दिन माणकशाह ने अपने संकल्प का शुभारम्भ किया। जब वे वर्तमान के मगरवाड़ा के निकट थे, डाकुओं के एक दल ने इन पर हमला कर दिया। माणकशाह अपनी तपस्या के चलते मौन धारण किए हुए थे और शत्रुंजय का ध्यान करते हुए नवकार मन्त्र का मन ही मन जाप कर रहे थे। डाकुओं द्वारा उकसाए जाने पर भी उन्होंने अपनी तपस्या नहीं तोडी और मौन रहे। इससे गुस्साए डाकुओं ने उन पर वार कर उनके शरीर को तीन हिस्सों में काट दिया। माणकशाह, जो अंतिम श्वास तक नवकार मन्त्र के जाप और शत्रुंजय की पवित्रता में पूरी तरह से लीन थे, इन्द्र मणिभद्रवीर देव के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने अपने दैवीय प्रताप से अपने शरीर के तीनों भागों को अलग-अलग दिशाओं में भेजा। पिंडी (शरीर का निचला हिस्सा) गुजरात के मगरवाड़ा में गिरा, धड़ अर्थात शरीर का ऊपरी हिस्सा गुजरात के आग्लोड़ में गिरा, और मस्तक अर्थात सिर मध्य प्रदेश के उज्जैन में उनके घर में गिरा। मूलतया भारत में मणिभद्र वीर के ये तीन स्थान ही हैं – उज्जैन, आग्लोड़ एवम् मगरवाड़ा।

कुछ समय बाद इधर अचानक आचार्य श्री आनन्दविमल सूरीजी के साधुओं का असमय कालधर्म होने लगा। आचार्य श्री ने ध्यान लगाया तो अधष्ठायक देव ने दिव्य संकेत दिया कि आप गुजरात के मगरवाड़ा गाँव में जाकर अट्ठम तप पूर्वक साधना करेंगे तो यह उपद्रव मिट जायेगा। गुरदेव वहाँ पहुँचे और ध्यान तप किया, जिसके फलस्वरूप मणिभद्र जी साक्षात प्रकट हुए और अपना परिचय दिया कि मैं आपका वही अनुयायी माणकशाह सेठ हूँ। शुभ ध्यान पूर्वक मृत्यु पाकर मैं मणिभद्र देव के रूप में उत्पन्न हुआ हूँ। फिर गुरुदेव से उपद्रव की बात सुन उन्होंने भैरवों को वश में किया तथा भविष्य में मुनि हत्या न करने की प्रतिज्ञा दी।

इसके पश्चात मणिभद्र जी ने गुरुदेव से विनती करी की मेरी जागृति के लिए आप तपागच्छ के उपाश्रय में मेरी स्थापना करवाइए ताकि आने वाले साधु-साधवियाँ मुझे धर्म लाभ देते रहें और जो भी मुझे सच्चे मन से याद करेगा मैं उसकी हर मनोकामना पूर्ण करूँगा और जिन शासन की हमेशा रक्षा व सहायता करूँगा। गुरुदेव ने इनका सम्मान करते हुए महासुदी पंचमी को मगरवाड़ा में इनके पिंड को स्थापित कर मंदिर का निर्माण करवाया।

वर्तमान में बड़ी संख्या में भक्तगण मगरवाड़ा जाकर मणिभद्रवीर से अपनी समस्याओं के समाधान व अपनी परेशानियों को दूर करने में मदद के लिए प्रार्थना करते हैं। ये भी कहा जाता है की अगर कोई भक्त मणिभद्रवीर देव के दर्शन व पूजा तीनो स्थानों पर एक ही दिन में अर्थात सूर्योदय से सूर्यास्त तक के बीच में करते हैं , अपने देव को अपनी भक्ति व प्रार्थनाएं समर्पित करने का ये सबसे उत्तम तरीका है।
मणिभद्र वीर देव के कुछ प्रमुख लक्षण

  • मणिभद्र देव एकावतारी तथा सम्यक दृष्टी देव हैं।
  • प्रतिमा पर इनका मुख अधिकतर वराह के रूप में होता है।
  • इनकी प्रतिमाएँ चार भुजा और कई बार छह भुजाओं के साथ दिखाई देती हैं।
  • यक्षराज मणिभद्र जी वर्तमान समय के इन्द्र माने जाते हैं, जिनका वाहन ऐरावत (सफ़ेद हाथी जिसकी एक से अधिक सूँड है) है।
  • विशेषकर इनकी पूजा अष्टमी, चौदस और दीवाली के दिन होती है। महीने की हर पाँचम को भक्तों की बड़ी संख्या यहाँ आकर इनकी पूजा करते हैं। इनके विशेष दिन रविवार व गुरूवार हैं और इनके भक्त जैन भोजन (जमीकंद रहित) पर रहकर भी इनके प्रति अपनी आस्था, सम्मान व्यक्त कर सकते हैं।
  • सुखड़ी और श्रीफल (नारियल) इनका पसंदीदा भोजन है व इन्हें प्रसाद के रूप में अर्पण किया जाता है।
  • महिलाएँ इनके दर्शन कर सकती हैं, प्रार्थनाएँ दे सकती हैं, इन्हें मान सकती हैं किन्तु, इनकी पूजा या प्रतिमा पर केसर चन्दन लगाकर पूजा नहीं कर सकतीं।
  • क्षराज मणिभद्रवीर जी वर्तमान समय के इन्द्र माने जाते हैं। उन्हें जिन शासन रक्षक के रूप में भी जाना जाता है। मणिभद्रवीर देव चमत्कारों की रचना के लिए जाने जाते हैं।कहा जाता है इनकी पूजा करने से धन वैभव मिलता है व बुरी शक्तियों से संरक्षण मिलता है।

उज्जैन में भैरवगढ़ में माणकशाह की जन्मभूमि हवेली, जहाँ उनका मस्तक आकर गिरा था, वहाँ जैनाचार्य श्री आनन्दविमल श्री करकमलों से श्री मणिभद्र जी की स्थापना हुई थी। समय के प्रवाह से हवेली करीब 600 सालों से काल के थपेड़े खाकर जीर्ण-क्षीर्ण हुई।

विक्रम संवत 2039 में चारूप तीर्थ में मणिभद्र देव द्वारा दिए प्रत्यक्ष दर्शन के बाद प.पू. पन्यास प्रवर गुरुदेव श्री अभयसागरजी म.सा. के लिखित आदेश से उंनके पट्टधर शिष्य प.पू. आचार्य श्री अशोकसागर सुरीश्वर जी म.सा. ने इस जन्मभूमि हवेली का जीर्णोद्धार कराया तथा नूतन केशरियानाथ जी के जिनालय का निर्माण करा कर विक्रम संवत 2066 महासुदी ग्यारस दिनांक 11 फरवरी 2010 को इस तीर्थ की स्थापना सम्पन्न कराई। वर्तमान में इस तीर्थ में श्रद्धालु यात्रियों के ठहरने व भोजन की उत्तम व्यवस्था है।

  • श्री आग्लोड़ जैन तीर्थ मगरवाड़ा से 80 किलोमीटर ( पौने दो घंटे ) की दुरी पर है।कहा जाता है की मणिभद्रवीर का धड़ अर्थात शरीर यहाँ गिरा था और यहाँ धड़ की ही पूजा की जाती है।भक्त अपनी पूजा मगरवाड़ा में इनके चरणों व शरीर के निचले हिस्से से शुरू करते हुए आग्लोड़ में शरीर की पूजा कर उज्जैन में सर की पूजा पूर्ण कर सकते हैं।
  • गुजरात के मगरवाड़ा (पालनपुर जिला ) में मणिभद्रवीर दादा के शरीर के निचले हिस्से अर्थात पिंडी की प्रतिमा जी है।इनके भक्त बड़ी संख्या में अपनी पूजा अर्चना समर्पित करने व अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए यहाँ आते हैं।मणिभद्रवीर देव चमत्कारों की रचना के लिए जाने जाते हैं।कहा जाता है इनकी पूजा करने से धन वैभव मिलता है व बुरी शक्तियों से संरक्षण मिलता है.

श्री मणिभद्र वीर जी से जुड़ी चमत्कारी घटनाएँ
भैरवगढ़, उज्जैन स्थित मणिभद्र वीर जी के मंदिर के जीर्णोधार व केशरियानाथ जिनालय की स्थापना

प.पू. पन्यास प्रवर गुरुदेव श्री अभयसागरजी म.सा. के लिखित आदेश से उंनके पट्टधर शिष्य प.पू. आचार्य श्री अशोकसागर सुरीश्वर जी म.सा. ने माणकशाह की जन्मभूमि हवेली स्थित मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तथा केशरियानाथ जी के जिनालय का निर्माण करा कर विक्रम संवत 2066 महासुदी ग्यारस दिनांक 11 फरवरी 2010 को इस तीर्थ की स्थापना सम्पन्न कराई।

केशरियानाथ जी की मूर्ति की विधिवत स्थापना के अंतर्गत किए जा रहे हवन के दौरान अचानक हवनकुंड की अग्नि तीव्र हो चली व कई फीट ऊंची लपटें उठने लगी। इसी समय मणिभद्र वीर जी देव की मूर्ति के ऊपर लगा हुआ चाँदी का छत्र अपने-आप पंखे की भांति गोल-गोल घूमने लगा.

यह घटना 9 जून 2016 को घटी थी। प्रति माह की सुदी पंचमी की भांति मणिभद्र जी के मंदिर में भव्य हवन व पूजन का आयोजन किया गया था। जब हवन चल रहा था, अचानक हवनकुंड में से उठ रही लपटों में मणिभद्र वीर जी के वराह अवातर की ऐरावत हाथी पर बैठी हुई आकृति दिखाई देने लगी। यह घटना कुछ देर चली। उस समय एक श्रद्धालु द्वारा मोबाईल से इस घटना का फोटो लिए गया था।

श्री माणिभद्रवीर जी की स्तुति

घरेलु सहू काम सिद्ध करवा चो देव साचा तमे

ने विघ्नों सघला विनाश करवा, चो शक्ति शाली तमे

सेवे जे चरणों खरा ह्रदय थी , तेहने उपाधि नथी

एव श्री मंदिभद्र देव तमने , वंदु खरा भावति

देव सुख समस्त जानने , जे छे सदा जगता

सेवना कर्नारना पलकमाँ , कष्टों बघा कापता

सीधी सर्व मले आने भय टले , आपे सदा सन्मति

एव श्री मणिभद्र देव तमने वंदु घना भाव थी

श्री मणिभद्रवीर स्तोत्र

ॐ नमामि मणिभद्रं वन्दे वीर महाबलिं ।

विपत्तिकाले माँ रक्ष, रक्ष माँ देव माणिभद्रे ।।

ॐ आं क्रों ह्रीं मंत्ररूपे महाबलीं रक्षं सदा ।

माँ शरणं शरणं तव, रक्ष माँ देव माणिभद्रे ।।

भ्रां भ्रीं भूम भ्रं: मंत्ररूपे तव भक्ति प्रभावतः ।

प्रत्यक्षं दर्शनं देहि, रक्ष माँ देव ! माणिभद्रे ।।

धर्मार्थ काम मोक्षच्चेव, कामदात, सुखसंपदा ।

महाभीती विनाशय रक्ष माँ देव ! माणिभद्रे ।।

झां झीं झूम झ: मंत्ररूपे, तव शरी शुशोभितं ।

सत्राम सः ते तु प्रत्यक्षम, रक्ष माँ देव ! माणिभद्रे ।।

सुखाड़ी श्रीफ़लंशचैव, ,कामदं मोक्षदं सदा ।

आधीं व्याधीं विपत्तीम च, रक्ष माँ देव ! माणिभद्रे ।।

राजभयं चोरभयं नास्ति, न च सर्पेण डस्यते ।

सर्व मंगल कारकं देव, रक्ष माँ देव ! माणिभद्रे ।।

ॐ ह्रीं श्रीं माणिभद्राय तुंगभद्राय क्राम क्लीं नमोस्तुते स्वाहा ।

ॐ ह्रीं माणिभद्राय भद्रे नमोस्तुते स्वाहा ।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मम हृदये माणिभद्राय नमोस्तुते स्वाहा ।।

श्री माणिभद्रवीरजी की आरती

(रागः- जय जय आरती आदि जिणंदा….)

जय जय आरती माणिभद्र ईन्द्रा, बावन वीर शीर मुगट जडींद्रा ।

तपगच्छ अधिष्ठायक विख्याता अतिय विघन दुःख हरो विधाता ।

तुम सेवकनां संकट चुरो, मन वंछित सुख संपदा पूरो ।

खडग त्रिशूल डमरु गाजे, मृगदल अंकुश नाग विराजे ।

षट् भूजा गज वाहन सुन्दर, लोढी पोशाल संघ वृद्धि पुरन्दर ।

विनये श्री आणंद सुरिधीर,

आशा पूरा मगरवाडिया वीर,

आशा पूरा उज्जनीया वीर,

आशा पूरा आगलोडीया वीर ।

श्री माणिभद्रवीर जी का मन्त्र

|| ॐ असीआउसा नमः श्री माणिभद्र दिसतु मम सदा सर्वकार्येषु सिद्धिं ||

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Jai Jinendra

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